राज दरबार…..

साद घालतो रानवारा….. !

अरे दिवाळी साजरी करा……….

राम राज्य आले हो…
म्हणजे काय ?
अरे गरिबांपेक्षा श्रीमंताची संख्या वाढली म्हणजे रामराज्यच ना !,

सकाळ सकाळी डोक्यावर नाही पडलो आहे, खरोखर दिवाळी साजरी करा…

नैशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकॉनमिक रिसर्च (एनसीएईआर) च्या रिसर्च (हाउ इंडिया अर्न्स, स्पेंड्स एंड सेव्स) प्रमाणे भारतात आता श्रींमतांची संख्या गरिबांपेक्षा जास्त झाली आहे.

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन साल में इकनॉमिक स्लोडाउन के बावजूद मार्च 2010 तक देश में हाई इनकम परिवारों की संख्या 4 करोड़ 67 लाख हो जाने अनुमान लगाया गया है जबकि लो इनकम परिवारों की तादाद 4 करोड़ 10 लाख के आसपास मानी जा रही है। अगर यह सच है तो पिछले एक दशक में आया यह बहुत बड़ा बदलाव है। हाई इनकम ग्रुप का परिवार उसे माना जाता है, जिसकी सालाना आमदनी 2001-02 की महंगाई के आधार पर एक लाख 80 हजार से ज्यादा हो। जिस परिवार के सदस्य सालाना 45 हजार रुपये तक कमाते हों, उसे लो इनकम फैमिली माना जाता है।

सालाना 45 हजार रुपये से ज्यादा और एक लाख 80 हजार रुपये से कम कमाने वाले मिडल क्लास में आते हैं। एनसीएईआर का एस्टिमेट है कि मिडल इनकम हाउसहोल्ड्स की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। एक दशक पहले लो इनकम परिवारों की तादाद 6 करोड़ 52 लाख थी। तब मिडल इनकम फैमिलीज़ की संख्या 10 करोड़ 92 लाख थी, जो अब 14 करोड़ 7 लाख होने का अनुमान है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्लोडाउन का सबसे ज्यादा असर मिडल क्लास परिवारों पर पड़ा। नंबरों के लिहाज से मिडल क्लास परिवारों की संख्या भले ही 2007-08 के 13 करोड़ 59 लाख से बढ़कर 2009-10 में 14 करोड़ 7 लाख हो गई हो, लेकिन पर्सेंटेज मंे यह घट गई है। 2007-08 में मिडल इनकम परिवार कुल परिवारों के जहां 62 पर्सेंट थे, वहीं 2009-10 में यह घटकर 61.6 पर्सेंट रह गए। दिलचस्प पहलू यह है कि हाई इनकम परिवारों की तादाद स्लोडाउन के दौरान भी बढ़ती रही। पिछले दो साल में यह 16.8 पर्सेंट से बढ़कर 20.5 पर्सेंट हो गई है। लो इनकम ग्रुप फैमिलीज़ की संख्या भी इस दौरान 21.1 पर्सेंट से घटकर 17.9 पर्सेंट रह गई।

2 लाख से 10 लाख रुपये सालाना कमाने वालों को वर्ल्ड बैंक मिडल क्लास मानता है। ऐसे लोगों की संख्या 2009-10 तक बढ़कर 2 करोड़ 84 लाख हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश के मिडल क्लास में से दो-तिहाई परिवार शहरों में रहते हैं। यही नहीं, सेविंग करने में भी भारतीय आगे हैं। अनुमान है कि भारतीय परिवारों द्वारा की जाने वाली बचत की रकम जीडीपी के 36 पर्सेंट तक होती है।

खरं असेल बॉ !
गेल्या एक दोन महिन्यात एकापण शेतकर्‍याने आत्महत्या केली नाही आहे.
गेल्या काही महिन्यात हॉस्पिटलमध्ये / हॉस्पिटलच्या बाहेर औषधाला पैसे नाहीत म्हणून कोणी मेलं नाही आहे.
गेल्या काही दिवसापासून भारतात कुठे ही भुकबळी गेला नाही आहे.
गेल्या काही दिवसापासून रोजगार नाही म्हणून कोणी भिक व चोर्‍या करायला चालू केले नसेल.
गेल्या काही दिवसापासून महागाई किती ही वाढू दे जनतेला काहीच फरक पडत नाही आहे..

अरे हेच हेच तर ते रामराज्य !!!!

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